मामले की शुरुआत उस ई-मेल से हुई, जो परीक्षा के बाद विश्वविद्यालय को मिला। इसमें दावा किया गया था कि तीन जुलाई को सहायक प्रोफेसर ने छात्रों के व्हाट्सएप ग्रुप में परीक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल साझा किए थे। आठ जुलाई को परीक्षा होने के बाद जब इन सवालों का प्रश्नपत्र से मिलान किया गया तो उनमें काफी समानता मिली।







